सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ पर निबंध । Suryakant Tripathi ‘Nirala’ Essay

Suryakant-Tripathi-Nirala-essay, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ एक महान हिंदी कवि थे जिन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में जागरूकता फैलाई और मानवीय अन्याय एवं असमानता के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने अपनी कविताओं में रोमांच, उत्साह, और देशभक्ति के भाव को सुंदरता से प्रस्तुत किया।

निराला को छायावादी कविता के प्रमुख रूपरेखाओं में माना जाता है। उनकी कविताओं में प्राकृतिक तत्त्वों, भावनाओं, और अभिव्यक्ति की विविधता को महसूस किया जाता है। उन्होंने मानवीयता, न्याय, स्वतंत्रता, और समाजिक विकास को लेकर विचार किया और इसे अपनी कविताओं में उत्कृष्टता से प्रस्तुत किया।

सूर्यकांत त्रिपाठी की कविताओं में मानवीय दुःख और पीड़ा का विवरण होता है, जिसमें उन्होंने समाज में असमानता, न्यायाधीनता की कमी, और व्यक्तिगत तौर पर भावनात्मक दुःख को उजागर किया। उनकी कविताओं में सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों के प्रति विचारशीलता और संवेदनशीलता का भाव दिखता है।

निराला की कविताओं में उन्होंने व्यक्तिगत और सामाजिक रूप से अन्याय और असमानता के खिलाफ विरोध का समर्थन किया और व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता की महत्ता पर भी जोर दिया। उनकी कविताओं में मानवता और समाज के प्रति प्रेम व्यक्त होता है जो उन्हें एक युगान्तरकारी कवि बनाता है।

जीवन परिचय

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म 21 फरवरी 1897 को बंगाल के मिधापुर (Midnapore) जिले में हुआ था। उनके पिता का नाम पंडित गंगाधर शरण त्रिपाठी था। निराला की माता का नाम निर्मला देवी था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा महिषादल, पूर्वी मिधापुर में प्राप्त की थी। उनकी माता की मृत्यु के बाद, उन्होंने लखनऊ जाकर अंग्रेजी और संस्कृत साहित्य का अध्ययन किया।

निराला ने रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे महान व्यक्तित्वों से प्रेरणा ली और उनके विचारों से प्रभावित हुए। ये व्यक्तित्व ने उनके जीवन और लेखन को गहराई और व्यापकता दी।

निराला की जीवनी में त्रासदियों से भरी कई घटनाएं रहीं, जो उन्होंने अपने जीवन के दौरान पाया। उनका काव्य और लेखन उनके जीवन की विभिन्न पहलुओं को दर्शाते हैं।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की जीवनयात्रा वाकई कठिनाइयों से भरी रही। उनकी शादी मनोहरा देवी से हुई थी और उन्होंने हिंदी को सीखा ताकि अपनी पत्नी के साथ संवाद कर सकें। निराला ने अपनी पत्नी के साथ कुछ सुखद वर्ष बिताए, लेकिन उनकी दुःखद मृत्यु ने उन्हें व्यथित कर दिया। उन्होंने अपनी बेटी सरोज की भी मृत्यु का सामना किया, जो उनके दुख को और भी गहरा बना दिया। यह दुखद घटनाएं उन्हें भावनात्मक और मानसिक रूप से टूटने का सामना करना पड़ा।

इस समय में, जब उन्होंने अपने परिवार की विपरीत स्थितियों का सामना किया, तब उन्हें आर्थिक समस्याओं का सामना भी करना पड़ा। उन्होंने कई प्रकाशकों के लिए काम किया और प्रूफ-रीडर के रूप में भी काम किया। इन सभी अन्निस्तों के बावजूद, उन्होंने लेखन की प्रकृति को जीवंत रखा और अपनी कला में निरंतरता बनाए रखी।

निराला की मृत्यु अक्टूबर 15, 1962 को हुई थी, जिसने उनकी दुनिया को एक महान कवि की यादगार और अमूल्य विरासत छोड़ी।

प्रमुख रचनाएँ

काव्य (Poetry) उपन्यास (Novels) कहानी संग्रह (Short Stories)
अनामिका (1923) अप्सरा (1931) लिली (1934)
परिमल (1930) अलका (1933) सखी (1935)
गीतिका (1936) प्रभावती (1936) सुकुल की बीवी (1941)
तुलसीदास (1939) निरुपमा (1936) चतुरी चमार (1945)
कुकुरमुत्ता (1942) कुल्ली भाट (1938-39)
अणिमा (1943) बिल्लेसुर बकरिहा (1942)
बेला (1946) चोटी की पकड़ (1946)
नये पत्ते (1946) काले कारनामे (1950)
अर्चना (1950) इन्दुलेखा (अपूर्ण)
आराधना (1953)
गीत कुंज (1954)

कार्यक्षेत्र

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की पहली नौकरी महिषादल राज्य में ही थी। वहां उन्होंने 1918 से 1922 तक काम किया। इसके बाद, उन्होंने संपादन, स्वतंत्र लेखन और अनुवाद का काम किया। 1922 से 1923 के दौरान, उन्होंने कोलकाता से प्रकाशित ‘समन्वय’ का संपादन किया, और 1923 के अगस्त से मतवाला के संपादक मंडल में काम किया।

बाद में, उन्होंने गंगा पुस्तक माला कार्यालय, लखनऊ में नौकरी की, जहां वे ‘सुधा’ मासिक पत्रिका के संबंध में काम किया था। उन्होंने यहां से 1935 तक कार्य किया। 1935 से 1940 तक, वे लखनऊ में भी समय बिताया। इसके बाद, 1942 से उन्होंने अपने मृत्यु तक इलाहाबाद में रह कर स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य किया।

निराला की पहली कविता ‘जन्मभूमि’ जून 1920 में ‘प्रभा’ मासिक पत्र में प्रकाशित हुई थी, और पहला कविता संग्रह ‘अनामिका’ नाम से 1923 में आया था। उनका पहला निबंध ‘बंग भाषा का उच्चारण’ अक्टूबर 1920 में ‘सरस्वती’ मासिक पत्रिका में प्रकाशित हुआ था।

लेखन कार्य

निराला ने लगभग 1920 ईसवी के आसपास लेखन का कार्य शुरू किया। उनकी पहली रचना ‘जन्मभूमि’ एक गीत था। ‘जूही की कली’, जो उनकी प्रथम रचना के रूप में जानी जाती है, वास्तविक रूप से 1921 ईसवी के आसपास लिखी गई थी, जिसे निराला ने स्वयं 1916 ईसवी का दावा किया था, और यह 1922 ईसवी में पहली बार प्रकाशित हुई थी। निराला ने कविता के साथ-साथ कहानी और गद्य की अन्य विधाओं में भी बहुत कुछ लिखा।

प्रकार काम का शीर्षक
कविताएँ अणिमा
कविताएँ अनामिका
कविताएँ अपरा
कविताएँ अर्चना
कविताएँ आराधना
कविताएँ कुकुरमुत्ता
कविताएँ गीतगुंज
कविताएँ गीतिका
कविताएँ जन्मभूमि
कविताएँ जागो फिर एक बार
कविताएँ तुलसीदास
कविताएँ तोड़ती पत्थर
कविताएँ ध्वनि
कविताएँ नये पत्ते
कविताएँ परिमल
कविताएँ प्रियतम
कविताएँ बेला
कविताएँ भिक्षुक
कविताएँ राम की शक्ति पूजा
कविताएँ सरोज स्मृति
उपन्यास अप्सरा
उपन्यास अलका
उपन्यास इन्दुलेखा
उपन्यास काले कारनामे
उपन्यास चमेली
उपन्यास चोटी की पकड़
उपन्यास निरुपमा
उपन्यास प्रभावती
कहानियाँ चतुरी चमार
कहानियाँ देवी
कहानियाँ सुकुल की बीवी
कहानियाँ साखी
कहानियाँ लिली
निबंध चयन
निबंध चाबुक
निबंध प्रबंध पद्य
निबंध प्रबंध प्रतिमा
निबंध प्रबंध परिचय
निबंध बंगभाषा का उच्चारण
निबंध रवीन्द्र-कविता-कानन
संग्रह संग्रह

निष्कर्ष

निराला जी की योगदान से हमारी साहित्यिक धारा में विविधता और समृद्धि आई। उनके काव्य, उपन्यास, कहानी संग्रह, निबन्ध-आलोचना, पुराण कथा, बाल साहित्य और अनुवाद जैसे विभिन्न क्षेत्रों में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान है। उनकी रचनाएं हमें मानवता, समाज, धर्म और जीवन के विभिन्न पहलुओं को समझने में मदद करती हैं। निराला जी का योगदान साहित्य के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण मोर्चा बना रहा है, जो आज भी हमारे समाज में उनकी महत्वाकांक्षा और सोच को सजीव रखता है।

उनकी रचनाओं में विशेषता और अद्वितीयता है जो हमें आज भी प्रेरित करती है। निराला जी की साहित्यिक यात्रा ने हमें साहित्यिक समृद्धि की ओर अग्रसर किया है और उनका योगदान हमारे समृद्ध और सामृद्धिक भारतीय साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा रहेगा।

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