समाज और कुप्रथा पर निबंध । Essay on Social Evil in Hindi

हम लोग जिस भारत देश में रहते है । भारत देश में विभिन्न जाति व धर्म के लोग रहते है । जिनका पहनावा, खाना-पीना, रहन-सहन तथा बोलचाल की भाषा भी भिन्न – भिन्न होता है।

अगर हम उतर भारत से दक्षिण भारत की यात्रा करे तो निश्चित ही अलग – अलग तरह के लोग मिलेंगे । जिनका बोल चाल व रहन सहन अलग होगा । ऐसे में हमें विश्वास करना मुश्किल हो जाता है की ये सभी भी भारत के भू भाग है।

भारत देश में लोग जहां रहते है वहाँ के अनुसार पुकारा जाता है । जैसे भारत के पूर्व में हिमाचल है, जहाँ ऊँचे -ऊँचे पर्वत है जिसके वजह से वहाँ के लोग को पहाड़ी क्षेत्र के नाम से जाने जाते है । और ऐसे ही कुछ लोग जंगल वाले क्षेत्र में रहते है तो उनको लोग आदिवासी के नाम से जाना जाता है । उनका भी पहनावा बिलकुल अलग ही होता है।

हम लोग जिस समाज के बीच रहते है । वहाँ हर प्रकार के मनुष्य जाति व धर्म के आधार पर रहते है । अगर एक व्यक्ति सभ्य बन पाता है तो उसका पीछे का कारण उसका समाज होता है । और यदि व्यक्ति बीच मति भेद है तो वो भी समाज की ही देन होती है।

समाज की स्थापना

हर समाज की स्थापना मनुष्यों द्वारा पारस्परिक विकास के लिए किया गया है । इसी समाज की वजह से मानव में आपसी सहयोग करता रहता है । अच्छे समाज की वजह से लोगों के अंदर सभ्यता, संस्कृति व भाषा का विकास होता है।

इसी समाज में भी कुरीतियाँ व कुप्रथाएँ विकार के कारण बनती है । समाज में कुछ विसंगति की वजह से लोगों के अंदर समाज के विरुद्ध व्यवधान पैदा होने लगता है । जिसके वजह से कुप्रथाएँ प्रचलित हो जाती है।

मनुष्य का सामूहिक विकास का आधार समाज ही होता है । मनुष्य के बीच सही और गलत को लेकर हमेशा समाज में संघर्ष चलता रहता है । जो अप्रवृति वाले लोग होते है वो हमेशा सही प्रवृति वाले लोग द्वारा बनाये गये नियम कानून का पालना न करके बस समाज को परेशान करने में लगे रहते है।

समाज में कुप्रथा का प्रभाव

समाज में कुछ विसंगति व अंतर्विरोध की वजह से समाज में हो रहे विकास में बाधा बन जाता है । जिसके वजह से शांति से हो रहे कामों के बीच समाज के कई लोगों को कठिनाई का सामना करना पड़ता है।

कुछ विसंगति लोग समाज में अपने मन का करने लगते है । वे हमेशा अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने के चक्कर में नियमों को तोडना व समाज के सामने नवीन सामाजिक व्यवस्था को पेश करने लगते है । जिसके वजह से समाज के विकास में व्यवधान पैदा होने लगता है।

इस समय देख जाये तो समाज में विरोधी तत्वों ने अपनी शक्ति को बढ़ावा दे रहा है । वो सत्य मार्ग पर चल रहे लोगों को हटाने में अपनी उपलब्धि हासिल की है । इसी की वजह से समाज में कुप्रथा का प्रसार व फैलाव देखा जा रहा है।

कई लोग तो समाज में लोगों को उनके जाति धर्म एक आधार पर उनके साथ समाज में घृणा की जाती है । उनको समाज के सदस्य नहीं माना जाता है । उन्हें अछूत के नाम पर विरोध का समाना करना पड़ता है।

समाज में पहले विधवा महिला का शादी करना अपराध माना जाता था । उसके लिए श्रंगार करना अपराध तथा बहुत साधारण वस्त्र धारण करने के लिए कहा जाता था। परन्तु इस समय अलग ही है।

बाल-विवाह को भी कानून द्वारा अपराध माना गया है । परन्तु इसके विपरीत समाज में कम उम्र के बच्चियों को ज्यादा उम्र के बूढ़े लोगो के साथ शादी की जा रही है।

कुप्रथा की कुछ ऐसी चीज है जैसे श्राद्ध, ब्रह्म भोज, सती प्रथा, घूँघट प्रथा, स्त्रियों को शिक्षा नहीं देना, जादू टोने, शगुन – अपशगुन विचारधारा की वजह से समाज को निरंतर तोड़े जा रही है।

निष्कर्ष

हमें समाज में लोगों के भाषा तथा धर्म को लेकर किसी को भी टिप्पणी नहीं करना चाहिए । हमें समाज के हित में जो हो सके उसको आगे बढ़ाने का काम करना चाहिए । सभी समाज के लोग को सम्मान के साथ रहना चाहिए।

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