विवाह एक सामाजिक संस्था । Marriage a Social Institution Hindi

विवाह एक ऐसी सामाजिक संस्था है जिससे समाज का सांस्कृतिक व धार्मिक अंश जुड़ा होता है । ये सभी समाज के लिए एक महोत्सव के सामान होता है । अगर विवाह बिना समाज के होता है तो वो एक काल्पनिक की तरह बिखर जाती है । और समाज फ्शुवत के सामना हो जाता है।

समाज एक मानव जाति का हजारों वर्षों से की गयी तपस्या, प्रयत्नों, संघर्षों व उपलब्धियों का परिणाम है । लेकिन आज ये ही समाज में आज का विवाह अभिशाप बन रहा है क्योंकि सामाजिक संस्था के होते हुए भी धर्मोन्मुखी बने हुआ है।

समाज हर एक विवाह को सही तरीके से सुव्यवस्थित करने में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है । विवाह के इस शुभ अवसर पर लड़का लड़की को समाज के द्वारा पति पत्नी का दर्जा दिया जाता है । एक दूसरे को प्रेम पूर्वक पूरे जीवन एक साथ व्यतीत करने का अधिकार दिया जाता है।

विवाह हमेशा धर्म के आधार पर होता है लेकिन इस समय के लोग धर्म को न मानते हुए । एक – दूसरे के अलग धर्म से शादी कर रहे है । जिसको समाज कतई स्वीकार करने को तैयार नहीं होता है । वो इस तरीके के विवाह को पशुवत तथा सामाजिक संस्था व धर्म के खिलाफ मानता है।

विवाह को एक धार्मिक पर्व क्यों माना जाये

असल में देखा जाये तो विवाह को लोग एक धार्मिक पर्व के रूप में ही मनाते है । परन्तु कुछ धर्मों के विवाह का एक अलग ही प्रथा है । हालाँकि सब धर्म में अपने अनुसार विवाह का एक अलग प्रथा होता है।

जैसे की मुस्लिम वर्ग के में एक पुरुष कई विवाह यानि की वह बहुपति या बहुपत्नीवाद बनने का समर्थन करता है । और वह तलाक से पुरुष के लिए सर्वथा अनुकूल होता है । परन्तु इस सब के चक्कर में स्त्रियों की स्वतंत्रता व समानता के लिए घातक साबित होता है।

तलाक शुदा औरतों का जीवन पुरुषों के अन्याय व अत्याचार को सहन करते हुए व्यतीत करती है । परन्तु उनके अपने अधिकार के लिए लड़ाई लड़नी पड़ती है । कोर्ट कचहरी का चक्कर लगाना पड़ता है । समाज के विरुद्ध आवाज उठाना पड़ता है, क्योंकि वही समाज उसकी आज़ादी छीन लेता है।

ऐसे ही हिन्दू धर्म सनातन धर्म में दहेज प्रथा को लेकर स्त्रियों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है । समाज के शादी हो जाने बाद भी कन्या के कमजोर पक्ष होने के बावजूद उसको दहेज के नाम पर प्रताड़ित किया जाता है।

जो बाप अपने बेटी के लिए दहेज का व्यवस्था नहीं हो पाता है तो उसके बेटी लिए जीवन जीना बहुत भारी पड़ता है । उस स्त्री का जीवन हमेशा सिसकता रहता है, क्योंकि उसको समाज में शादी होने के बाद भी प्रताड़ित किया जाता है।

इस सब कार्यों के बाद स्त्रियों को देख कर ये ही लगता है की समाज में उनकी पुरुषों के समान समानता ही नहीं है । हमेशा स्त्रियों को पुरुष के मुकाबले कम आका गया है । शादी को लेकर मोल भाव, जाति धर्म लेकर ही समाज बटा हुआ है।

समाज में विवाह का महत्व

हर एक समाज में विवाह एक अलग ही महत्व होता है । सभी वर्ग में शादी बड़ी धूम धाम व रीति रिवाज के साथ किया जाता है । मनुष्य एक सभ्य प्राणी के तरह समाज द्वारा स्थापित सभी वैवाहिक संबंधों को रीति रिवाज के साथ मनाता है।

कई लोगों को समाज द्वारा स्थापित रस्में व रीति रिवाज पसंद आता है, तो कुछ लोगों को नहीं आता है । समाज में कुछ रस्में सही होती है तो कुछ स्त्रियों के लिए विपरीत होती है । स्त्रियों का कहना होता है की पुरुषों की तरह उनको सामान अधिकार नहीं मिलता है।

उनके दहेज के नाम पर प्रताड़ित किया जाता है । उनको बहुत सारी ससुराल पक्ष द्वारा यातनाये सहनी पड़ती है । जो समाज के द्वारा ही आरोप लगाये जाते है।

निष्कर्ष

समाज के संस्था द्वारा सभी पुरुष स्त्रियों को सामान अधिकार मिलना चाहिए । ताकि समाज की सभ्यता बनी रहे है । लोगों की वैवाहिक जीवन सुखी व सम्पन्न बना रहे।

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